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।। बुध स्त्रोत्रम् ।।

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 ॥ बुधस्तोत्रम् ॥ बुधो बुद्धिमतां श्रेष्ठो बुद्धिदाता धनप्रदः ।  प्रियंगुकलिकाश्यामः कंजनेत्रो मनोहरः ॥ १ ॥ ग्रहोपमो रौहिणेयो नक्षत्रेशो दयाकरः । विरुद्धकार्यहंता च सौम्यो बुद्धिविवर्धनः ॥ २ ॥ चन्द्रात्मजो विष्णुरूपी ज्ञानीज्ञो ज्ञानिनायकः । ग्रहपीडाहरो दारपुत्रधान्यपशुप्रदः ॥ ३ ॥ लोकप्रियः सौम्यमूर्तिर्गुणदो गुणिवत्सलः । पञ्चविंशति नामानि बुधस्यैतानि यः पठेत् ॥ ४॥ स्मृत्वा बुधं सदा तस्य पीडा सर्वा विनश्यति ।      तद्दिने वा पठेद्यस्तु लभते स मनोगतम् ॥ ५ ॥                          ॥ इति ॥ 

शिव-पूजनके लिये विहित पत्र-पुष्प।सहस्र गुना फल देने वाले पुष्प।भविष्य पु...

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शिव - पूजनके लिये विहित पत्र - पुष्प  भगवान् शंकरपर फूल चढ़ानेका बहुत अधिक महत्त्व है । बतलाया जाता है कि तपःशीलगुणोपेते विप्रे वेदस्य दत्त्वा सुवर्णस्य शतं तत्फलं कुसुमस्य च ॥ ( वीरमित्रोदय) तपःशील सर्वगुणसम्पन्न वेदमें निष्णात किसी ब्राह्मणको में सुवर्ण दान करनेपर जो फल प्राप्त होता है , वह भगवान् शंकरपर सौ फूल चढ़ा देनेसे प्राप्त हो जाता है । कौन - कौनसे पत्र - पुष्प शिवके लिये विहित है और कौन - कौन निषिद्ध हैं , इनकी जानकारी अपेक्षित है । अतः उनका उल्लेख यहाँ किया जाता है विष्णोर्यानीह चोक्तानि पुष्पाणि च पत्रिकाः । केतकीपुष्पमेकं तु विना तान्यखिलान्यपि । शस्तान्येव सुरश्रेष्ठ शंकराराधनाय हि ॥ ( नारद ) पहली बात यह है कि भगवान् विष्णुके लिये जो - जो पत्र और पुष्प विहित हैं , वे सब भगवान् शंकरपर भी चढ़ाये जाते हैं । केवल केतकी - केवड़ेका निषेध है । शास्त्रोंने कुछ फूलोंके चढ़ानेसे मिलनेवाले फलका तारतम्य बतलाया है , जैसे सर्वासा पुष्पजातीनां नीलमुत्पलम् ॥ ( वीरमित्रोदय , पूजाप्रकाश )   करवीरसमा ज्ञेया जातीबकुलपाटलाः । श्वेतमन्दारकुसुमं सितपा शमीपुष्पं बृहत्याश्च कुसु...

नवनाग स्तुति।कालसर्प दोष दुर करने वाला।

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॥ नवनागस्तुतिः ॥   अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम् ।  शङ्खपालं धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा ॥१ ॥  एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम् ।  सायंकाले पठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः ॥२ ॥  विषाद्भयं तस्य नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत् ॥                ॥ इति ॥

प्रातःकालीन उठ कर करे इस स्तुति का पाठ शिव स्तुति: "सद्धर्मचिन्तामणौ"

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 ।।  अथ  शिवस्तुतिः ।।  प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं  गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।  खट्वाड़्गशूलवरदाभयहस्तमीशं  संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥ १।। प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजार्धदेहं सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् ।  विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोभिरामं  संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥ २।। प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं  वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् ।  नामादिभेदरहितं षडभावशून्यं  संसाररोगहरमौषधमदितीयम् ।।३।।  प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति ।  ते दुःखजातं बहुजन्मसञ्चितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भोः । ।।इति शिवस्तुतिः  सद्धर्मचिन्तामणौ।।

।।मंगल स्त्रोत्रम् ।। mangal stotram

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          ॥ मंगलस्तोत्रम् ॥ मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः । स्थिरासनो महाकायः सर्वकर्मविरोधकः ॥ १ ॥ लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः । धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः ॥ २ ॥ अंगारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः । वृष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः ॥ ३ ॥ एतानि कुजनामानि नित्यं यः श्रद्धया पठेत् । ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् । कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥ ५ ॥ स्तोत्रमंगारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः । न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित् ॥ ६ ॥ अंगारकमहाभाग भगवन्भक्तवत्सल । त्वां नमामि ममाशेषमणमाश विनाशय ॥ ७ ॥ ऋणरोगादिदारिद्र्यं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः ।  भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥ ८ ॥ अतिवक्र दुराराध्य भोगमुक्त जितात्मनः । तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥ ९ ॥ विरिञ्चिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा । तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः ॥ १० ॥ पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः ।  ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः ॥ ११ ॥ एभिर्वादशभिः श्लोक...

।।चन्द्र स्त्रोत्रम् ।।chandra stotram

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      ॥ चन्द्रस्तोत्रम् ॥ चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते । यानि श्रुत्वा नरो दुःखान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १ ॥ सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरब्जः कुमुदप्रियः । लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥ २ ॥ शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः । आत्रेय इन्दु शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥ ३ ॥ जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णवसम्भवः । नक्षत्रनायकः शम्भुशिरश्चूडामणिविभुः ॥ ४ ॥ तापहर्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् । प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥ ५ ॥ तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत् सर्वं समीहितम् । ग्रहादीनां य सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥ ६ ॥                             ॥ इति ॥ 

सूर्यग्रहण मे क्या करे,क्या न?।surya grahan 21june ,2020।क्या है कंकणाकृ...

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सूर्यग्रहण मे करे ये कार्य   आइए जानते हैं आने वाले सूर्य ग्रहण के विषय में ग्रहण में किन मंत्रों स्तोत्रो की उपासना करनी चाहिए?   मंत्र दीक्षा लेनी चाहिए ?   कैसे जल में स्नान करना चाहिए ? दान करना चाहिए? तो चलिए शुरू करते हैं इस ग्रहण के बारे में।यह सूर्य ग्रहण मिथुन राशि में होने वाला कंकणाकृती ग्रहण है और यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा। इसका का स्पर्श काल और पूर्ण मोक्ष काल दोनों ही भारत में दिखाई देंगे। इसके बाद भारत में कंकणाकृती ग्रहण 2031 में लगभग 11 वर्षों बाद में दिखाई देगा । सूर्य ग्रहण का समय दिनांक : 21/06/2020 10/03Am to 03/28 pm स्पर्श :10/03 ग्रहण मध्यकाल : 11/41 ग्रहण मोक्ष : 01/32 पूर्ण काल : 03/28 एक अण्डाकार कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करना पृथ्वी से चंद्रमा को देखते हुए, इसकी कक्षा लगभग 13% छोटी और बड़ी हो जाती है।  जब चंद्रमा पृथ्वी के करीब होता है, तो चंद्रमा की परिक्रमा सूर्य की कक्षा से बड़ी दिखाई देगी।  अगर उस समय सूर्य ग्रहण होता है, तो यह खग्रास होगा। क्योंकि चंद्रमा की परिक्रमा सूर्य की परिक्रमा को पूरी तरह से कवर...