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Showing posts from June, 2020

।।चन्द्र स्त्रोत्रम् ।।chandra stotram

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      ॥ चन्द्रस्तोत्रम् ॥ चन्द्रस्य शृणु नामानि शुभदानि महीपते । यानि श्रुत्वा नरो दुःखान्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १ ॥ सुधाकरश्च सोमश्च ग्लौरब्जः कुमुदप्रियः । लोकप्रियः शुभ्रभानुश्चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥ २ ॥ शशी हिमकरो राजा द्विजराजो निशाकरः । आत्रेय इन्दु शीतांशुरोषधीशः कलानिधिः ॥ ३ ॥ जैवातृको रमाभ्राता क्षीरोदार्णवसम्भवः । नक्षत्रनायकः शम्भुशिरश्चूडामणिविभुः ॥ ४ ॥ तापहर्ता नभोदीपो नामान्येतानि यः पठेत् । प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तस्तस्य पीडा विनश्यति ॥ ५ ॥ तद्दिने च पठेद्यस्तु लभेत् सर्वं समीहितम् । ग्रहादीनां य सर्वेषां भवेच्चन्द्रबलं सदा ॥ ६ ॥                             ॥ इति ॥ 

सूर्यग्रहण मे क्या करे,क्या न?।surya grahan 21june ,2020।क्या है कंकणाकृ...

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सूर्यग्रहण मे करे ये कार्य   आइए जानते हैं आने वाले सूर्य ग्रहण के विषय में ग्रहण में किन मंत्रों स्तोत्रो की उपासना करनी चाहिए?   मंत्र दीक्षा लेनी चाहिए ?   कैसे जल में स्नान करना चाहिए ? दान करना चाहिए? तो चलिए शुरू करते हैं इस ग्रहण के बारे में।यह सूर्य ग्रहण मिथुन राशि में होने वाला कंकणाकृती ग्रहण है और यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा। इसका का स्पर्श काल और पूर्ण मोक्ष काल दोनों ही भारत में दिखाई देंगे। इसके बाद भारत में कंकणाकृती ग्रहण 2031 में लगभग 11 वर्षों बाद में दिखाई देगा । सूर्य ग्रहण का समय दिनांक : 21/06/2020 10/03Am to 03/28 pm स्पर्श :10/03 ग्रहण मध्यकाल : 11/41 ग्रहण मोक्ष : 01/32 पूर्ण काल : 03/28 एक अण्डाकार कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करना पृथ्वी से चंद्रमा को देखते हुए, इसकी कक्षा लगभग 13% छोटी और बड़ी हो जाती है।  जब चंद्रमा पृथ्वी के करीब होता है, तो चंद्रमा की परिक्रमा सूर्य की कक्षा से बड़ी दिखाई देगी।  अगर उस समय सूर्य ग्रहण होता है, तो यह खग्रास होगा। क्योंकि चंद्रमा की परिक्रमा सूर्य की परिक्रमा को पूरी तरह से कवर...

।।सूर्य स्त्रोत्रम्।। surya stotram।।

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                 || सूर्यस्तोत्रम् ॥ नवग्रहाणां   सर्वेषां सूर्यादीनां  पृथक्  पृथक् । पीडा च दुःसहा  राजञ्जायते सततं नृणाम् ॥ १ ॥ पीडानाशाय  राजेन्द्र नामानि  शृणु भास्वतः । सूर्यादीनां च सर्वेषां पीडा नश्यति शृण्वतः ॥ २ ॥ आदित्यः सविता सूर्यः पूषाऽर्कः शीघ्रगो रविः । भगस्त्वष्टाऽर्यमा हंसो हेलिस्तेजोनिधिहरिः ॥ ३ ॥ दिननाथो दिनकरः सप्तसप्तिः प्रभाकरः । विभावसुर्वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ॥ ४ ॥ हरिदश्वः कालवक्रः कर्मसाक्षी जगत्पतिः । पद्मिनीबोधको भानुर्भास्करः करुणाकरः ॥ ५ ॥ द्वादशात्मा विश्वकर्मा लोहिताङ्गस्तमोनुदः । जगन्नाथोऽरविन्दाक्षः कालात्मा कश्यपात्मजः ॥ ६ ॥ भूताश्रयो ग्रहपतिः सर्वलोकनमस्कृताः । जपाकुसुमसंकाशो भास्वानदितिनन्दनः ॥ ७ ॥ ध्वान्तेभसिंहः सर्वात्मा लोकनेत्रो विकर्तनः । मार्तण्डो मिहिरः सूरस्तपनो लोकतापनः ॥ ८ ॥ जगत्कर्ता जगत्साक्षी शनैश्चरपिता जयः ।  सहस्ररश्मिस्तरणिर्भगवान्भक् तवत्सलः ॥ ९ ॥ विवस्वानादिदेवश्च देवदेवो दिवाकरः । धन्वन्तरिाधिहर्ता दद्रुकुष्ठविना...

क्या है अजपाजप ?

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अजपाजप ' मानव - शरीर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और दुर्लभ है । यदि शास्त्रके अनुसार इसका उपयोग किया जाय तो मनुष्य ब्रह्मको भी प्राप्त कर सकता है । इसके लिये शास्त्रोंमें बहुत - से साधन बतलाये गये हैं । उनमें सबसे सुगम साधन है — ' अजपाजप ' । इस साधनसे पता चलता है कि जीवपर भगवान्की कितनी असीम अनुकम्पा है । अजपाजपका संकल्प कर लेनेपर चौबीस घंटोंमें एक क्षण भी व्यर्थ नहीं हो पाता – चाहे हम जागते हों , स्वप्नमें हों या सुषुप्तिमें हों , प्रत्येक स्थितिमें ' हंसः'२ का जप श्वास क्रियाद्वारा अनायास होता ही रहता है । संकल्प कर देनेसे यह जप मनुष्यद्वारा किया हुआ माना जाता है । ( क ) किये हुए अजपाजपके समर्पणका संकल्प - ' ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः , अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे . भरतखण्डे ... भारतवर्षे .... स्थाने .... नामसंवत्सरे .... ऋतौ ... मासे .... पक्षे .... तिथौ .... दिने प्रातःकाले .... गोत्रः , शर्मा ( वर्मा गुप्तः )अहं स्तनसूर्योदयादारभ्य अद्यतनसूर्योदयपर्यन्त श्वासक्रियया भगवता कारि...

आइये जाने पंचांग के बारे मे | क्या है पंचांग ?

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/ / अथ पंचांग विचार प्रकरण // मुहुर्त का विचार करते समय हमें पंचांग की आवश्यकता होती है पंचांग अर्थात् पांच अंगों का समूह जो इस प्रकार हैं | १ तिथि २ वार ३ नक्षत्र ४ योग ५ करण • अब हम इन पांच अंगों के विषय में विस्तार पूर्वक जानेंगे | (१) तिथि * तिथि अर्थात सूर्य और चंद्र के बीच की दूरी दर्शाने वाली संज्ञा          || पक्षतिथि ज्ञान || शुक्ल कृष्णावुभौ पक्षौ देव पित्रे च कर्मणि | प्रतिपच्च द्वितीया च तृतीया तदनंतरम् || चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी चाष्टमी तथा | नवमी दशमी चैवैकादशी द्वादशी ततः || त्रयोदशी ततोज्ञेया ततः प्रोक्ता चतुर्दशी | पौर्णिमा शुक्लपक्षे तु कृष्णपक्षेत्वमास्मृता || • देव कर्म में शुक्ल पक्ष एवं पित्र पक्ष में कृष्ण पक्ष ऐसे दो पक्ष हैं  उनमें प्रथमा द्वितीय तृतीय चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी अष्टमी नवमी दशमी एकादशी द्वादशी त्रयोदशी चतुर्दशी और शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा एवं कृष्ण पक्ष में अमावस्या तिथि का उल्लेख है | (२) वार  * सूर्य उदय होने के बाद अगले दिन सूर्य उदय होने तक के समय को वार कहा जाता है           ...

आइये वेद विषय के बारे मे जाने (घन मन्त्र सुने)

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*वेद मन्त्रो के पाठ के ग्यारह तरीके* चारो वेद के मन्त्रो को लाखों वर्षो से संरक्षित करने के लिए, वेदमन्त्रों के पदो मे मिलावट ,कोई अशुद्धि न हो इसलिए  *हमारे ऋषि मुनियो ने 11 तरह के पाठ करने की विधि बनाई।* *_वेद के हर मन्त्र को 11 तरह से पढ सकते हैं।_* 11 पाठ के पहले तीन पाठ को प्रकृति पाठ व अन्य आठ को विकृति पाठ कहते हैं।      *||प्रकृति पाठ||*  १ संहिता पाठ  २ पदपाठ  ३ क्रमपाठ     *||विकृति पाठ||* ४ जटापाठ ५ मालापाठ ६ शिखापाठ ७  लेखपाठ ८  दण्डपाठ ९ ध्वजपाठ १० रथपाठ ११ घनपाठ          *१ संहिता पाठ*  इसमे वेद मन्त्रों के पद को अलग किये बिना ही  पढा जाता है।  जैसे   अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म् । होता॑रं रत्न॒धात॑मम् ॥           *२ पदपाठ* इसमें पदो को अलग करके क्रम से उनको पढा जाता है अ॒ग्निम् । ई॒ळे॒ । पु॒रःऽहि॑तम् । य॒ज्ञस्य॑ । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् । होता॑रम् । र॒त्न॒ऽधात॑मम् ॥          *३ क्रम पाठ* पदक्रम- १ ...